अरण्यकाण्ड · 01
तृतीय सोपान-मंगलाचरण
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 1: तृतीय सोपान-मंगलाचरण। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
श्लोक · 1
मूलंधर्मतरो र्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरं वंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्॥1॥
श्लोक · 2
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुंदरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्। राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥2॥
श्लोक
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥
चौपाई · 1
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥1॥
चौपाई · 2
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥
चौपाई · 3
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥3॥
चौपाई · 4
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।