अरण्यकाण्ड · 03
ऋषि अत्रि स्तुति
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 3: ऋषि अत्रि स्तुति। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
सोरठा · 3
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥3॥
सोरठा · 1
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥ भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥1॥
सोरठा · 2
निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं॥ प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥2॥
सोरठा · 3
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥ निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥3॥
सोरठा · 4
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥ मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥4॥
सोरठा · 5
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥ विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥5॥
सोरठा · 6
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥ भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥6॥
सोरठा · 7
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥ पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥7॥
सोरठा · 8
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥ निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांतिते गतिं स्वकं॥8॥
सोरठा · 9
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥ जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥9॥
सोरठा · 10
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥ स्वभक्त कल्पपादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥10॥
सोरठा · 11
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥ प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥11॥
सोरठा · 12
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥ व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥12॥
दोहा · 4
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।