अरण्यकाण्ड · 10

श्री सीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता, मारीच प्रसंग और स्वर्णमृग रूप में मारीच का मारा जाना

अरण्यकाण्ड का प्रकरण 10: श्री सीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता, मारीच प्रसंग और स्वर्णमृग रूप में मारीच का मारा जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

चौपाई · 1

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥

चौपाई · 2

जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥

चौपाई · 3

लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥ दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥3॥

चौपाई · 4

नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥4॥

दोहा · 24

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥24॥

चौपाई · 1

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥ होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥1॥

चौपाई · 2

तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥ तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥2॥

चौपाई · 3

मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥ सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं॥3॥

चौपाई · 4

भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥ जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥4॥

दोहा · 25

जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड। खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥25॥

चौपाई · 1

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥ गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा॥1॥

चौपाई · 2

तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥ सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥2॥

चौपाई · 3

उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥3॥

चौपाई · 4

अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥ मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥4॥

छन्द

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्रीसहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥

दोहा · 26

मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥26॥

चौपाई · 1

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपट मृग भयऊ॥ अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥1॥

चौपाई · 2

सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥ सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥2॥

चौपाई · 3

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥ तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन॥3॥

चौपाई · 4

मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥ प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥4॥

चौपाई · 5

सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी॥ प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी॥॥5॥

चौपाई · 6

निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥ कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥6॥

चौपाई · 7

प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥ तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥7॥

चौपाई · 8

लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥ प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥8॥

चौपाई · 9

अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥9॥

दोहा · 27

बिपुल सुमर सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥27॥

चौपाई · 1

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥ आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥1॥

चौपाई · 2

जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥ भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥2॥

चौपाई · 3

मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥ बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥3॥

चौपाई · 4

सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥4॥

चौपाई · 5

सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥ इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥5॥

चौपाई · 6

नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई॥ कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं॥6॥

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।