अरण्यकाण्ड · 14
नारद मुनि-श्री राम संवाद
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 14: नारद मुनि-श्री राम संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा॥ बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥1॥
चौपाई · 2
चक्रबाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई॥ सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई॥2॥
चौपाई · 3
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए॥ चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला॥3॥
चौपाई · 4
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना॥ सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ॥4॥
चौपाई · 5
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं॥5॥
दोहा · 40
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥40॥
चौपाई · 1
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा॥ देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया॥1॥
चौपाई · 2
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए॥ बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला॥2॥
चौपाई · 3
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी॥ मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा॥3॥
चौपाई · 4
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई॥ यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना॥4॥
चौपाई · 5
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी॥ करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई॥5॥
चौपाई · 6
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे॥6॥
दोहा · 41
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि॥41॥
चौपाई · 1
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक॥ देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी॥1॥
चौपाई · 2
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करऊँ दुराऊ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहुँ तुम्ह मागी॥2॥
चौपाई · 3
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें॥ तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई॥3॥
चौपाई · 4
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥ राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥4॥
दोहा
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम॥42 क॥
दोहा
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ॥42 ख॥
चौपाई · 1
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी॥ राम जबहिं प्रेरेउ निज माया मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया॥1॥
चौपाई · 2
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा॥ सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥2॥
चौपाई · 3
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥ गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥3॥
चौपाई · 4
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता॥ मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी॥4॥
चौपाई · 5
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही॥ यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं॥5॥
दोहा · 43
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि॥43॥
चौपाई · 1
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥1॥
चौपाई · 2
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥ दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥2॥
चौपाई · 3
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥ पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥3॥
चौपाई · 4
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधियारी॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥4॥
दोहा · 44
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥44॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।