अयोध्याकाण्ड · 05

कैकेयी का कोपभवन में दशरथ जी के साथ संवाद, दशरथ का शोक, सुमन्त्र का महल में जाना

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 5: कैकेयी का कोपभवन में दशरथ जी के साथ संवाद, दशरथ का शोक, सुमन्त्र का महल में जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 24

साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥24॥

चौपाई · 1

कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥ सुरपति बसइ बाहँबल जाकें। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥1॥

चौपाई · 2

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥ सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥2॥

चौपाई · 3

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥ भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥3॥

चौपाई · 4

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अनअहिवातु सूच जनु भाबी॥ जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥4॥

छन्द

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

सोरठा · 25

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥25॥

चौपाई · 1

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥ कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥1॥

चौपाई · 2

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥2॥

चौपाई · 3

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥ जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥3॥

चौपाई · 4

बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥। घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥4॥

दोहा · 26

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकिमृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥26॥

चौपाई · 1

पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥1॥

चौपाई · 2

रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥ दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥2॥

चौपाई · 3

ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥3॥

चौपाई · 4

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥ कपट सनेहु बढ़ाई बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥4॥

दोहा · 27

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥27॥

चौपाई · 1

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥ थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥1॥

चौपाई · 2

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ परु बचनु न जाई॥2॥

चौपाई · 3

नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥3॥

चौपाई · 4

तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥ बाद दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥4॥

दोहा · 28

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥28॥

चौपाई · 1

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥1॥

चौपाई · 2

तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥2॥

चौपाई · 3

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥3॥

चौपाई · 4

माथें हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥4॥

चौपाई · 5

अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हिसि अचल बिपति कै नेईं॥5॥

दोहा · 29

कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥29॥

चौपाई · 1

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥ भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥1॥

चौपाई · 2

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें॥ देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥2॥

चौपाई · 3

देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥3॥

चौपाई · 4

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥4॥

दोहा · 30

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥30॥

चौपाई · 1

आगें दीखि जरत सिर भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥1॥

चौपाई · 2

लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥2॥

चौपाई · 3

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥3॥

चौपाई · 4

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥4॥

दोहा · 31

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥31॥

चौपाई · 1

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥1॥

चौपाई · 2

रिस परिहरु अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥ एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥2॥

चौपाई · 3

अजहूँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥3॥

चौपाई · 4

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥ जासु सुभाउ अरिहि अनूकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥4॥

दोहा · 32

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥32॥

चौपाई · 1

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥ कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥ सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥2॥

चौपाई · 3

कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥ देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥3॥

चौपाई · 4

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥ जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥4॥

दोहा · 33

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥33॥

चौपाई · 1

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥1॥

चौपाई · 2

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनूकूला॥2॥

चौपाई · 3

लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥3॥

चौपाई · 4

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥4॥

दोहा · 34

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥34॥

चौपाई · 1

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥ कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥1॥

चौपाई · 2

पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥ जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥2॥

चौपाई · 3

दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥ दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥3॥

चौपाई · 4

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥4॥

दोहा · 35

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥35॥

चौपाई

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥ सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥

चौपाई · 2

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥ करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥2॥

चौपाई · 3

तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥3॥

चौपाई · 4

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥ फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥4॥

दोहा · 36

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥36॥

चौपाई · 1

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥ हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥1॥

चौपाई · 2

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥ भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥2॥

चौपाई · 3

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥3॥

चौपाई · 4

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥4॥

दोहा · 37

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥37॥

चौपाई · 1

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥ जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥1॥

चौपाई · 2

गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाइ खाई जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥2॥

चौपाई · 3

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥3॥

चौपाई · 4

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहु कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥4॥

दोहा · 38

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ ना मरमु महीसु॥38॥

चौपाई · 1

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥ चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥1॥

चौपाई · 2

सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥2॥

चौपाई · 3

समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥ राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥3॥

चौपाई · 4

निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥ रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥4॥

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।