अयोध्याकाण्ड · 07

श्री राम-दशरथ संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 7: श्री राम-दशरथ संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 45

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥45॥

चौपाई · 1

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥ चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥1॥

चौपाई · 2

आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥2॥

चौपाई · 3

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥3॥

चौपाई · 4

सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥4॥

दोहा · 46

मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥46॥

चौपाई · 1

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥1॥

चौपाई · 2

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥2॥

चौपाई · 3

पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥ सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥3॥

चौपाई · 4

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥4॥

दोहा · 47

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥47॥

चौपाई · 1

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥1॥

चौपाई · 2

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥ एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥2॥

चौपाई · 3

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥ एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥3॥

चौपाई · 4

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥4॥

दोहा · 48

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥48॥

चौपाई · 1

एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥ खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥1॥

चौपाई · 2

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकई केरी॥ लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताहीं॥2॥

चौपाई · 3

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥ करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥3॥

चौपाई · 4

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥ कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥4॥

दोहा · 49

सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु करहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥49॥

चौपाई · 1

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥1॥

चौपाई · 2

नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥2॥

चौपाई · 3

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥3॥

चौपाई · 4

राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥ उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥4॥

छन्द

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिन समुझि धौं जियँ भामनी॥

सोरठा · 50

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥50॥

चौपाई · 1

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥ ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥1॥

चौपाई · 2

राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥2॥

चौपाई · 3

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥3॥

चौपाई · 4

अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।