अयोध्याकाण्ड · 10

श्री राम-लक्ष्मण संवाद

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 10: श्री राम-लक्ष्मण संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 69

सीतहि सासु आसीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥69॥

चौपाई · 1

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥1॥

चौपाई · 2

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥ सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा॥2॥

चौपाई · 3

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेहसब सन तृनु तोरें॥3॥

चौपाई · 4

बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥ तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥4॥

दोहा · 70

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥70॥

चौपाई · 1

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥ भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥1॥

चौपाई · 2

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा॥ गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू॥2॥

चौपाई · 3

रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥ जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥3॥

चौपाई · 4

रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी॥ सिअरें बचन सूखि गए कैसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें॥4॥

दोहा · 71

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥71॥

चौपाई · 1

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥ नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥1॥

चौपाई · 2

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥2॥

चौपाई · 3

जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥ मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥3॥

चौपाई · 4

धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥ मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।