अयोध्याकाण्ड · 17

तीर्थराज प्रयाग की महिमा, श्री राम ऋषि भरद्वाज संवाद

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 17: तीर्थराज प्रयाग की महिमा, श्री राम ऋषि भरद्वाज संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 105

सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम॥105॥

चौपाई · 1

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा॥1॥

चौपाई · 2

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्री मुख तीरथराज बड़ाई॥ करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा॥2॥

चौपाई · 3

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा॥3॥

चौपाई · 4

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥4॥

दोहा · 106

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि॥106॥

चौपाई · 1

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥ कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥1॥

चौपाई · 2

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥ भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥2॥

चौपाई · 3

आजु सफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू॥ सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥3॥

चौपाई · 4

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी॥ अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥4॥

दोहा · 107

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥107॥

चौपाई · 1

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा॥1॥

चौपाई · 2

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं॥2॥

चौपाई · 3

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी॥ भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए॥3॥

चौपाई · 4

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू॥ देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।