अयोध्याकाण्ड · 20
श्री राम-वाल्मीकि संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 20: श्री राम-वाल्मीकि संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 123
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ॥123॥
चौपाई · 1
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहु मुनि कोई॥1॥
चौपाई · 2
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई॥2॥
चौपाई · 3
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥ राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥3॥
चौपाई · 4
सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥4॥
दोहा · 124
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन॥124॥
चौपाई · 1
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥ देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने॥1॥
चौपाई · 2
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मँगाए॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए॥2॥
चौपाई · 3
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी॥ तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई॥3॥
चौपाई · 4
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥4॥
दोहा · 125
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥125॥
चौपाई · 1
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥ अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥1॥
चौपाई · 2
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥2॥
चौपाई · 3
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥ तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥3॥
चौपाई · 4
सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥ कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥4॥
छन्द
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥ जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
सोरठा · 126
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥126॥
चौपाई · 1
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥1॥
चौपाई · 2
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥
चौपाई · 3
चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥3॥
चौपाई · 4
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥4॥
दोहा · 127
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥
चौपाई · 1
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥1॥
चौपाई · 2
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥ जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥2॥
चौपाई · 3
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥ लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥3॥
चौपाई · 4
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥ तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥4॥
दोहा · 128
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥128॥
चौपाई · 1
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥1॥
चौपाई · 2
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥ कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥2॥
चौपाई · 3
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥ मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥3॥
चौपाई · 4
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥ तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥4॥
दोहा · 129
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥129॥
चौपाई · 1
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥ जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥
चौपाई · 2
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥ कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥
चौपाई · 3
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥ जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥
चौपाई · 4
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥ जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥4॥
दोहा · 130
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥130॥
चौपाई · 1
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥ नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥1॥
चौपाई · 2
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥ राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥2॥
चौपाई · 3
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥ सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥3॥
चौपाई · 4
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥ करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥4॥
दोहा · 131
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥131॥
चौपाई · 1
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥ कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥1॥
चौपाई · 2
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥ सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥2॥
चौपाई · 3
नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥ सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥3॥
चौपाई · 4
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥ चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।