अयोध्याकाण्ड · 22

सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना और सर्वत्र शोक देखना

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 22: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना और सर्वत्र शोक देखना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 141

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत॥141॥

चौपाई · 1

जोगवहिं प्रभुसिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥1॥

चौपाई · 2

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥2॥

चौपाई · 3

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥ मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥3॥

चौपाई · 4

राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥ देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥4॥

दोहा · 142

नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥142॥

चौपाई · 1

धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥ तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥1॥

चौपाई · 2

बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी॥ सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी॥2॥

चौपाई · 3

चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥ अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें॥3॥

चौपाई · 4

जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥ बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहिं भाँती॥4॥

दोहा · 143

भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥143॥

चौपाई · 1

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥ चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥1॥

चौपाई · 2

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥ रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥2॥

चौपाई · 3

भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥ अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥3॥

चौपाई · 4

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई॥ बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥4॥

दोहा · 144

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति॥144॥

चौपाई · 1

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥ रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥1॥

चौपाई · 2

लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥ सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥2॥

चौपाई · 3

बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥ हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥3॥

चौपाई · 4

बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥ राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥4॥

दोहा · 145

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि॥145॥

चौपाई · 1

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता। पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥1॥

चौपाई · 2

राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई॥ पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही॥2॥

चौपाई · 3

जोई पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥ पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥3॥

चौपाई · 4

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई॥ सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥4॥

दोहा · 146

हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु॥146॥

चौपाई · 1

एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥ बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥1॥

चौपाई · 2

पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥ बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा॥2॥

चौपाई · 3

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥ जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥3॥

चौपाई · 4

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥ नगर नारि नर ब्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।