अयोध्याकाण्ड · 33
इंद्र-बृहस्पति संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 33: इंद्र-बृहस्पति संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 216
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥216॥
चौपाई · 1
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥ ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥1॥
चौपाई · 2
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥ बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥2॥
चौपाई · 3
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥3॥
चौपाई · 4
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥4॥
दोहा · 217
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सप्रेम पयोधि। बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥217॥
चौपाई · 1
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥ मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥1॥
चौपाई · 2
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी। सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥2॥
चौपाई · 3
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥ लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥3॥
दोहा · 218
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु। अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु॥218॥
चौपाई · 1
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥ मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बैरु अधिकाईं॥1॥
चौपाई · 2
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥2॥
चौपाई · 3
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥ अगनु अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत प्रेम बस॥3॥
चौपाई · 4
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥ अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।