अयोध्याकाण्ड · 42
कौसल्या सुनयना-संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 42: कौसल्या सुनयना-संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 279
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥279॥
चौपाई · 1
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥ दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥1॥
चौपाई · 2
सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥ परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥2॥
चौपाई · 3
दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥ मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥3॥
चौपाई · 4
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥4॥
दोहा · 280
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥280॥
चौपाई · 1
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥ सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥1॥
चौपाई · 2
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥ कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥2॥
चौपाई · 3
सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥ पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥3॥
चौपाई · 4
सब सिय राम प्रीति की सि मूरति। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥4॥
दोहा · 281
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥281॥
चौपाई · 1
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥ जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी॥1॥
चौपाई · 2
कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥ कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥2॥
चौपाई · 3
ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥ देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥3॥
चौपाई · 4
भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥ सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥4॥
दोहा · 282
लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥282॥
चौपाई · 1
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥ राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥1॥
चौपाई · 2
भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥ कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥2॥
चौपाई · 3
जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥ कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥3॥
चौपाई · 4
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥ सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥4॥
दोहा · 283
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥283॥
चौपाई · 1
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥ रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥1॥
चौपाई · 2
तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥ गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥2॥
चौपाई · 3
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥ नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥3॥
चौपाई · 4
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥ देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥4॥
दोहा · 284
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय॥284॥
चौपाई · 1
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता॥ देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी॥1॥
चौपाई · 2
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥ सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥2॥
चौपाई · 3
रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय की दिनकर सोहै॥ रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू॥3॥
चौपाई · 4
अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपनें थल॥ यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।