बालकाण्ड · 16

शिवजी द्वारा सती जी का त्याग, शिवजी की समाधि

बालकाण्ड का प्रकरण 16: शिवजी द्वारा सती जी का त्याग, शिवजी की समाधि। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥ कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥1॥

चौपाई · 2

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥2॥

चौपाई · 3

बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥ हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥3॥

चौपाई · 4

सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥ जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥4॥

दोहा · 56

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥56॥

चौपाई · 1

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥ एहिं तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥1॥

चौपाई · 2

अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥ चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥2॥

चौपाई · 3

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥ सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥3॥

चौपाई · 4

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥4॥

दोहा

सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥57 क॥

सोरठा

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥57 ख॥

चौपाई · 1

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥ कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥1॥

चौपाई · 2

संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥ निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥2॥

चौपाई · 3

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥3॥

चौपाई · 4

तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥ संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥4॥

दोहा · 58

सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥58॥

चौपाई · 1

नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥ मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥1॥

चौपाई · 2

सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥ अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥2॥

चौपाई · 3

कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥ जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा॥3॥

चौपाई · 4

तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥ जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥4॥

दोहा · 59

तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥59॥

चौपाई · 1

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥ बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥1॥

चौपाई · 2

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥ जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥2॥

चौपाई · 3

लगे कहन हरि कथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥ देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥3॥

चौपाई · 4

बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥ नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥4॥

दोहा · 60

दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥60॥

चौपाई · 1

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥ बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥1॥

चौपाई · 2

सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥ सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥2॥

चौपाई · 3

पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥ जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥3॥

चौपाई · 4

पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥ बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥4॥

दोहा · 61

पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥61॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।