बालकाण्ड · 23

शिवजी पार्वती जी का विवाह और कैलाश आगमन

बालकाण्ड का प्रकरण 23: शिवजी पार्वती जी का विवाह और कैलाश आगमन। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥ गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥1॥

चौपाई · 2

पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥ बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥2॥

चौपाई · 3

बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥ हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥3॥

चौपाई · 4

दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥ अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥4॥

छन्द

दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥ सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥

दोहा · 101

नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥101॥

चौपाई · 1

बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥ जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥1॥

चौपाई · 2

करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥ बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥2॥

चौपाई · 3

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥ भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥3॥

चौपाई · 4

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥ सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥4॥

छन्द

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥ जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥

दोहा · 102

चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु। बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥102॥

चौपाई · 1

तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥ आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥1॥

चौपाई · 2

जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥ जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥2॥

चौपाई · 3

करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥ हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥3॥

चौपाई · 4

जब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥ आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥4॥

छन्द

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥

दोहा · 103

चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥103॥

चौपाई · 1

संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥ बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥1॥

चौपाई · 2

प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥ अहो धन्य तब जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥2॥

चौपाई · 3

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥3॥

चौपाई · 4

सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥ पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥4॥

दोहा · 104

प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥104॥

चौपाई · 1

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥ सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥1॥

चौपाई · 2

राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥ तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥2॥

चौपाई · 3

सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥ जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥3॥

चौपाई · 4

प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥ परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥4॥

दोहा · 105

सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद। बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद॥105॥

चौपाई · 1

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥ तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥1॥

चौपाई · 2

त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥ एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥2॥

चौपाई · 3

निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥ कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥3॥

चौपाई · 4

तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥ भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।