बालकाण्ड · 35
ऋषि विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा और अहल्या उद्धार- Protection of Sage Vishwamitra’s yajna and Redemption of Ahalya
बालकाण्ड का प्रकरण 35: ऋषि विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा और अहल्या उद्धार- Protection of Sage Vishwamitra’s yajna and Redemption of Ahalya। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥ होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥1॥
चौपाई · 2
सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥ बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥2॥
चौपाई · 3
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥ मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥3॥
चौपाई · 4
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥ भगति हेतु बहुत कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥4॥
चौपाई · 5
तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥ धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥5॥
चौपाई · 6
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥ पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥6॥
दोहा · 210
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥210॥
छन्द · 1
परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥1॥
छन्द · 2
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥2॥
छन्द · 3
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥3॥
छन्द · 4
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥4॥
दोहा · 211
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥211॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।