बालकाण्ड · 37
श्री राम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेम मुग्धता
बालकाण्ड का प्रकरण 37: श्री राम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेम मुग्धता। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥ बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥1॥
चौपाई · 2
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥ तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥2॥
चौपाई · 3
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥ उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥3॥
चौपाई · 4
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥ मूरति मधुर मनोहर देखी भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥4॥
दोहा · 215
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥215॥
चौपाई · 1
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥1॥
चौपाई · 2
सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥2॥
चौपाई · 3
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥3॥
चौपाई · 4
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥ रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥4॥
दोहा · 216
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम। मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम॥216॥
चौपाई · 1
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ॥ सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥1॥
चौपाई · 2
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥ सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥2॥
चौपाई · 3
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥ मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥3॥
चौपाई · 4
सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥ करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥4॥
दोहा · 217
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु। बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥217॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।