बालकाण्ड · 39
पुष्पवाटिका-निरीक्षण, श्री सीता-रामजी का परस्पर दर्शन
बालकाण्ड का प्रकरण 39: पुष्पवाटिका-निरीक्षण, श्री सीता-रामजी का परस्पर दर्शन। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 2
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥ लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥2॥
चौपाई · 3
नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रुख लजाए॥ चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥3॥
चौपाई · 4
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥ बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥4॥
दोहा · 227
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत। परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥227॥
चौपाई · 1
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥ तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥1॥
चौपाई · 2
संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥ सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥2॥
चौपाई · 3
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥ पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरुप सुभग बरु मागा॥3॥
चौपाई · 4
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥ तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4॥
दोहा · 228
तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन। कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन॥228॥
चौपाई · 1
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥ स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1॥
चौपाई · 2
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥ एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली॥2॥
चौपाई · 3
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी॥ बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥3॥
चौपाई · 4
तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥ चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥4॥
दोहा · 229
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत। चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥229॥
चौपाई · 1
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥ मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥1॥
चौपाई · 2
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥ भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥2॥
चौपाई · 3
देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥ जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥3॥
चौपाई · 4
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥ सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥4॥
दोहा · 230
सिय शोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि॥ बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥230॥
चौपाई · 1
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥ पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥1॥
चौपाई · 2
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥ सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥2॥
चौपाई · 3
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥ मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥3॥
चौपाई · 4
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥ मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥4॥
दोहा · 231
करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान। मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥231॥
चौपाई · 1
चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता॥ जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥1॥
चौपाई · 2
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥ देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥2॥
चौपाई · 3
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥ अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥3॥
चौपाई · 4
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥ जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥4॥
दोहा · 232
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ। निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाई॥232॥
चौपाई · 1
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥ मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥1॥
चौपाई · 2
भाल तिलक श्रम बिन्दु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥ बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥2॥
चौपाई · 3
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥ मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥3॥
चौपाई · 4
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥ सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥4॥
दोहा · 233
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान। देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥233॥
चौपाई · 1
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥ बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥1॥
चौपाई · 2
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥ नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥2॥
चौपाई · 3
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥ पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥3॥
चौपाई · 4
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥ धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।