लंकाकाण्ड · 08

रावण को पुनः मन्दोदरी का समझाना और अंगद-श्रीराम संवाद

लंकाकाण्ड का प्रकरण 8: रावण को पुनः मन्दोदरी का समझाना और अंगद-श्रीराम संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥ गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥1॥

चौपाई · 2

गहसि न राम चरन सठ जाई॥ सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥ भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥2॥

चौपाई · 3

सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥3॥

चौपाई · 4

उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥4॥

चौपाई · 5

पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥ रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥5॥

चौपाई · 6

हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई॥ प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥6॥

चौपाई · 7

जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी॥7॥

दोहा

रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥35 क॥

दोहा

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरीं रावनहिं बहुरि कहा समुझाइ॥35 ख॥

चौपाई · 1

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥1॥

चौपाई · 2

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥ कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥2॥

चौपाई · 3

रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥ जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥3॥

चौपाई · 4

अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥4॥

चौपाई · 5

बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥ जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला॥5॥

चौपाई · 6

भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही॥ सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥6॥

चौपाई · 7

सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी॥7॥

दोहा · 36

बधि बिराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मार्‌यो तेहि जानहु दसकंध॥36॥

चौपाई · 1

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥ कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥1॥

चौपाई · 2

सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥2॥

चौपाई · 3

तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥3॥

चौपाई · 4

काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥ निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥4॥

दोहा · 37

दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥37॥

चौपाई · 1

नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥ बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥1॥

चौपाई · 2

इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥ अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥

चौपाई · 3

बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहुँ पूछउँ तोही॥ रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥3॥

चौपाई · 4

तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए॥ सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप न गुन चारी॥4॥

चौपाई · 5

साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥ नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि पहिं आए॥5॥

दोहा

धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस॥38 क॥

दोहा

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥38 ख॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।