लंकाकाण्ड · 14
कुम्भकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण संवाद
लंकाकाण्ड का प्रकरण 14: कुम्भकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 62
सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥62॥
चौपाई · 1
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥ अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥1॥
चौपाई · 2
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥2॥
चौपाई · 3
कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥
चौपाई · 4
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥4॥
दोहा · 63
राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक। रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥63॥
चौपाई · 1
महिषखाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥ कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥1॥
चौपाई · 2
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥2॥
चौपाई · 3
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥3॥
चौपाई · 4
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥ धन्य धन्य तैं धन्य विभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥4॥
चौपाई · 5
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥5॥
दोहा · 64
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥64॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।