लंकाकाण्ड · 27
शिवजी की स्तुति, विभीषण की प्रार्थना, श्री रामजी के द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन और विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 27: शिवजी की स्तुति, विभीषण की प्रार्थना, श्री रामजी के द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन और विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
छन्द · 1
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥ मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥1॥
छन्द · 2
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥ काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥2॥
छन्द · 3
बिषय मनोरथ पुंज कुंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥ भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥3॥
छन्द
स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥ अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥ मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥4-5॥
दोहा · 115
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार ॥115॥
चौपाई · 1
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥1॥
चौपाई · 2
सकुल सदल प्रभु रावन मार्यो। पावन जस त्रिभुवन विस्तार्यो॥ दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥2॥
चौपाई · 3
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जन करिअ समर श्रम छीजे॥ देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥3॥
चौपाई · 4
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥ सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥4॥
दोहा
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥116 क॥
दोहा
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि। देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥116 ख॥
दोहा
बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर। सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥116 ग॥
दोहा
करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं। पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥116 घ॥
चौपाई · 1
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥ बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥1॥
चौपाई · 2
बहुरि विभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥ लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥
चौपाई · 3
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन॥ नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही॥3॥
चौपाई · 4
जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं॥ हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।