उत्तरकाण्ड · 07
अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 7: अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥ दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥1॥
चौपाई · 2
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥ पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥2॥
चौपाई · 3
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥ महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥3॥
चौपाई · 4
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥ बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥4॥
छन्द
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥ सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥
दोहा · 27
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥27॥
चौपाई · 1
सुमन बाटिका सबहिं लगाईं। बिबिध भाँति करि जतन बनाईं॥ लता ललित बहु जाति सुहाईं। फूलहिं सदा बसंत कि नाईं॥1॥
चौपाई · 2
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥2॥
चौपाई · 3
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥ जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥3॥
चौपाई · 4
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥ राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारू॥4॥
छन्द
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥ बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरि सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
दोहा · 28
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥28॥
चौपाई · 1
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥ पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥1॥
चौपाई · 2
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥ तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥2॥
चौपाई · 3
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥ तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥3॥
चौपाई · 4
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥ देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥4॥
छन्द
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥ बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
दोहा · 29
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥29॥
चौपाई · 1
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥1॥
चौपाई · 2
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥2॥
चौपाई · 3
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥3॥
चौपाई · 4
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥4॥
चौपाई · 5
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥5॥
दोहा · 30
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥30॥
चौपाई · 1
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥1॥
चौपाई · 2
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥ अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥2॥
चौपाई · 3
बिबिध कर्म गुन काल सुभाउ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥3॥
चौपाई · 4
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥ सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥4॥
दोहा · 31
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥31॥
चौपाई · 1
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥ सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥1॥
चौपाई · 2
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥ ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥2॥
चौपाई · 3
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥3॥
चौपाई · 4
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥4॥
दोहा · 32
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥32॥
चौपाई · 1
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥1॥
चौपाई · 2
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥ एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥2॥
चौपाई · 3
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥3॥
चौपाई · 4
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥ बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥4॥
दोहा · 33
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥33॥
चौपाई · 1
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥ जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥1॥
चौपाई · 2
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥2॥
चौपाई · 3
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥3॥
चौपाई · 4
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥4॥
दोहा · 34
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥34॥
चौपाई · 1
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥1॥
चौपाई · 2
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥ मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥2॥
चौपाई · 3
आस त्रास इरिषाद निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥3॥
चौपाई · 4
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥4॥
चौपाई · 5
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥5॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।