उत्तरकाण्ड · 10
श्री राम-वशिष्ठ संवाद, श्री रामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 10: श्री राम-वशिष्ठ संवाद, श्री रामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 47
– उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप। ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप॥47॥
चौपाई · 1
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥ अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥ देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा॥2॥
चौपाई · 3
महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥3॥
चौपाई · 4
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥ परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥4॥
दोहा · 48
तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कुहँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥48॥
चौपाई · 1
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥1॥
चौपाई · 2
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥ तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥2॥
चौपाई · 3
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥3॥
चौपाई · 4
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥4॥
दोहा · 49
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥49॥
चौपाई · 1
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥ हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥1॥
चौपाई · 2
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥ देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥2॥
चौपाई · 3
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥3॥
चौपाई · 4
मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥4॥
चौपाई · 5
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥5॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।