उत्तरकाण्ड · 15
गुरुजी का अपमान एवं शिवजी के शाप की बात सुनना
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 15: गुरुजी का अपमान एवं शिवजी के शाप की बात सुनना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह॥105क॥
सोरठा
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥105ख॥
चौपाई · 1
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई॥ सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥1॥
चौपाई · 2
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥ जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥2॥
चौपाई · 3
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥ अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥3॥
चौपाई · 4
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती॥ अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा॥4॥
चौपाई · 5
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥ धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥5॥
चौपाई · 6
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई॥ मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई॥6॥
चौपाई · 7
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा॥ कबि कोबिद गावहिं असि नीति। खल सन कलह न भल नहिं प्रीति॥7॥
चौपाई · 8
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥ मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई॥8॥
दोहा
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106क॥
दोहा
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥106ख॥
चौपाई · 1
मंदिर माझ भई नभबानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥ जद्यपि तव गुर के नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥1॥
चौपाई · 2
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥ जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥2॥
चौपाई · 3
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥3॥
चौपाई · 4
बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।