उत्तरकाण्ड · 20
भजन महिमा- The glory of Devotion
उत्तरकाण्ड का प्रकरण 20: भजन महिमा- The glory of Devotion। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥ मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥1॥
चौपाई · 2
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥2॥
चौपाई · 3
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥ सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥3॥
चौपाई · 4
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥4॥
चौपाई · 5
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥ सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥5॥
चौपाई · 6
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥6॥
चौपाई · 7
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥7॥
चौपाई · 8
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥8॥
चौपाई · 9
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥9॥
चौपाई · 10
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥10॥
दोहा
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥122क॥
दोहा
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥122ख॥
श्लोक
विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे। हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥122ग॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।