अयोध्याकाण्ड · 24
मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 24: मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 156
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥156॥
चौपाई · 1
तेल नावँ भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥ धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥1॥
चौपाई · 2
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥ सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए॥2॥
चौपाई · 3
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥ देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥3॥
चौपाई · 4
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥4॥
दोहा · 157
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाई॥157॥
चौपाई · 1
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥1॥
चौपाई · 2
एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥ असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥2॥
चौपाई · 3
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥ श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥3॥
चौपाई · 4
खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥ नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥4॥
चौपाई · 158
पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहि जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥158॥
चौपाई · 1
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥1॥
चौपाई · 2
सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई॥ भरत दुखित परिवारु निहारा॥ मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा॥2॥
चौपाई · 3
कैकेई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती॥ सुतिह ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें॥3॥
चौपाई · 4
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥ कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।