अयोध्याकाण्ड · 25
श्री भरत-कैकेयी संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 25: श्री भरत-कैकेयी संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 159
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥159॥
चौपाई · 1
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥1॥
चौपाई · 2
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥ तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी॥2॥
चौपाई · 3
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही॥ बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी॥3॥
चौपाई · 4
सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥ आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥4॥
दोहा · 160
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥160॥
दोहा · 1
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥ तात राउ नहिं सोचै जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥1॥
दोहा · 2
जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए॥ अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू॥2॥
दोहा · 3
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू॥ धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥3॥
दोहा · 4
जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही॥ पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा॥4॥
दोहा · 161
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥161॥
चौपाई · 1
जब मैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ॥ बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुँह परेउ न कीरा॥1॥
चौपाई · 2
भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी॥2॥
चौपाई · 3
सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
भे अति अहित रामु तेउ तोहीं। को तू अहसि सत्य कहु मोही॥ जो हसि सो हसि मुँह मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहि जाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।