अयोध्याकाण्ड · 39
श्री वशिष्ठजी का भाषण
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 39: श्री वशिष्ठजी का भाषण। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 252
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥252॥
चौपाई · 1
कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥ केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥1॥
चौपाई · 2
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥ मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥2॥
चौपाई · 3
मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥ जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥3॥
चौपाई · 4
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥4॥
दोहा · 253
गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥253॥
चौपाई · 1
बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥1॥
चौपाई · 2
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतु॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥2॥
चौपाई · 3
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥ बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥3॥
चौपाई · 4
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥ करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥4॥
दोहा · 254
राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥254॥
चौपाई · 1
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥ केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥1॥
चौपाई · 2
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥ उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥2॥
चौपाई · 3
भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥ जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥3॥
चौपाई · 4
दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥ सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥4॥
दोहा · 255
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचनगुर उर उमगा अनुरागु॥255॥
चौपाई · 1
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥1॥
चौपाई · 2
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥2॥
चौपाई · 3
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥ बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥3॥
चौपाई · 4
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥ कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥4॥
दोहा · 256
अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥256॥
चौपाई · 1
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥ भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥1॥
चौपाई · 2
गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥ औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥2॥
चौपाई · 3
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥3॥
चौपाई · 4
बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥ सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥4॥
दोहा · 257
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥257॥
चौपाई · 1
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ॥ नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥1॥
चौपाई · 2
सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किए मुदित फुर भाषें॥ प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई॥2॥
चौपाई · 3
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥3॥
चौपाई · 4
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥ मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।