अयोध्याकाण्ड · 40

श्री राम-भरतादि का संवाद

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 40: श्री राम-भरतादि का संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 258

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥258॥

चौपाई · 1

गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदयँ आनंदु बिसेषी॥ भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥1॥

चौपाई · 2

बोले गुरु आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई॥2॥

चौपाई · 3

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥3॥

चौपाई · 4

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥ भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥4॥

दोहा · 259

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥259॥

चौपाई · 1

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥ लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥1॥

चौपाई · 2

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥2॥

चौपाई · 3

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥3॥

चौपाई · 4

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहूँ खेल जितावहिं मोही॥4॥

दोहा · 260

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि प्रेम पिआसे नैन॥260॥

चौपाई · 1

बिधि न सकेऊ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥ यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥1॥

चौपाई · 2

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली॥2॥

चौपाई · 3

सपनेहूँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥ बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥3॥

चौपाई · 4

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥ गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥4॥

दोहा · 261

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ॥261॥

चौपाई · 1

भूपति मरन प्रेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥ देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं॥1॥

चौपाई · 2

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥ सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥2॥

चौपाई · 3

बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥ बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥3॥

चौपाई · 4

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥ जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी॥4॥

दोहा · 262

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि॥262॥

चौपाई · 1

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥ सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥1॥

चौपाई · 2

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥ बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥2॥

चौपाई · 3

तात जायँ जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें॥3॥

चौपाई · 4

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥4॥

दोहा · 263

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥263॥

चौपाई · 1

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥ तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥1॥

चौपाई · 2

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥2॥

चौपाई · 3

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥3॥

चौपाई · 4

तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥4॥

दोहा · 264

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु॥264॥

चौपाई · 1

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥1॥

चौपाई · 2

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥2॥

चौपाई · 3

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥3॥

चौपाई · 4

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥ हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥4॥

दोहा · 265

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥265॥

चौपाई · 1

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥ भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥1॥

चौपाई · 2

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सजह सुभायँ बिबस रघुराऊ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥2॥

चौपाई · 3

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥3॥

चौपाई · 4

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥4॥

दोहा · 266

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ॥266॥

चौपाई · 1

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥ गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥1॥

चौपाई · 2

अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥ मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥2॥

चौपाई · 3

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥ यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥3॥

चौपाई · 4

जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥ देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥4॥

दोहा · 267

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥267॥

चौपाई · 1

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥1॥

चौपाई · 2

जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची॥ सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई॥2॥

चौपाई · 3

स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका॥ यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥3॥

चौपाई · 4

देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥4॥

चौपाई · 1

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥1॥

चौपाई · 2

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत के चित चेतू॥2॥

चौपाई · 3

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥3॥

चौपाई · 4

अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥4॥

दोहा · 269

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥269॥

चौपाई · 1

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥1॥

चौपाई · 2

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥ जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥2॥

चौपाई · 3

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे॥ दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता॥3॥

चौपाई · 4

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चरबर जोरें हाथा॥ बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं॥4॥

दोहा · 270

नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ। मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ॥270॥

चौपाई · 1

कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोकबस बौरा॥ जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू॥1॥

चौपाई · 2

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥ भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥2॥

चौपाई · 3

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥3॥

चौपाई · 4

नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥4॥

दोहा · 271

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥271॥

चौपाई · 1

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥1॥

चौपाई · 2

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥2॥

चौपाई · 3

दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥3॥

चौपाई · 4

खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥4॥

दोहा · 272

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु॥272॥

चौपाई · 1

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥1॥

चौपाई · 2

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥2॥

चौपाई · 3

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥ राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी॥3॥

चौपाई · 4

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।