अयोध्याकाण्ड · 45
श्री राम-भरत संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 45: श्री राम-भरत संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 297
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु॥297॥
चौपाई · 1
प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥1॥
चौपाई · 2
समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साइँ दोहाईं॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥3॥
चौपाई · 4
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥4॥
दोहा · 298
कृपाँ भलाईं आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहुँ ओर॥298॥
चौपाई · 1
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥1॥
चौपाई · 2
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥2॥
चौपाई · 3
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥3॥
चौपाई · 4
सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥4॥
दोहा · 299
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर॥299॥
चौपाई · 1
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥1॥
चौपाई · 2
देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला। बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू॥2॥
चौपाई · 3
कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥ राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाई॥3॥
चौपाई · 4
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥4॥
दोहा · 300
सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि॥300॥
चौपाई · 1
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥1॥
चौपाई · 2
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥ अग्यासम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥2॥
चौपाई · 3
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥3॥
चौपाई · 4
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥ भरत बिनय सुनिदेखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥4॥
छन्द
रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी। मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी॥ भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥
सोरठा · 301
देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥301॥
चौपाई · 1
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥ काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥1॥
चौपाई · 2
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥2॥
चौपाई · 3
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥3॥
चौपाई · 4
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥4॥
दोहा · 302
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ॥302॥
चौपाई · 1
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥1॥
चौपाई · 2
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥2॥
चौपाई · 3
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥3॥
चौपाई · 4
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥4॥
दोहा · 303
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥303॥
चौपाई · 1
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥1॥
चौपाई · 2
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥2॥
चौपाई · 3
धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥ देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥3॥
चौपाई · 4
बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥4॥
दोहा · 304
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात॥304॥
चौपाई · 1
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥ समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥1॥
चौपाई · 2
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥2॥
चौपाई · 3
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥3॥
चौपाई · 4
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥4॥
दोहा · 305
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम॥305॥
चौपाई · 1
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू॥1॥
चौपाई · 2
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥ साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी॥2॥
चौपाई · 3
सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारू सुखारी॥ बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥3॥
चौपाई · 4
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के धाए॥4॥
दोहा · 306
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥306॥
चौपाई · 1
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी॥ सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥1॥
चौपाई · 2
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥2॥
चौपाई · 3
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को॥3॥
चौपाई · 4
अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई॥ सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥4॥
दोहा · 307
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ॥307॥
चौपाई · 1
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥1॥
चौपाई · 2
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥2॥
चौपाई · 3
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥3॥
चौपाई · 4
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥4॥
दोहा · 308
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥308॥
चौपाई · 1
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥1॥
चौपाई · 2
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥2॥
चौपाई · 3
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु विषादू॥3॥
चौपाई · 4
राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।