अयोध्याकाण्ड · 46
भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 46: भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 309
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥309॥
चौपाई · 1
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥ सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥1॥
चौपाई · 2
पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥2॥
चौपाई · 3
तब सेवकन्ह सरस थलुदेखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥ बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥3॥
चौपाई · 4
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥ प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥4॥
दोहा · 310
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥310॥
चौपाई · 1
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥ नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥1॥
चौपाई · 2
सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥ कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥2॥
चौपाई · 3
कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥ महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥3॥
चौपाई · 4
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥ मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥4॥
दोहा · 311
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात॥311॥
चौपाई · 1
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥ पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥1॥
चौपाई · 2
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥ सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥2॥
चौपाई · 3
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥ कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥3॥
चौपाई · 4
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥ फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।