अयोध्याकाण्ड · 47
श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 47: श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 312
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ॥312॥
चौपाई · 1
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥1॥
चौपाई · 2
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥ सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥2॥
चौपाई · 3
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी॥ करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी॥3॥
चौपाई · 4
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥ अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई॥4॥
दोहा · 313
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल॥313॥
चौपाई · 1
पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥1॥
चौपाई · 2
स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥2॥
चौपाई · 3
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो॥ आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥3॥
चौपाई · 4
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥ भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥4॥
दोहा · 314
दीनबंधु सुनि बंधु के वचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन॥314॥
चौपाई · 1
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहूँ न कलेसू॥1॥
चौपाई · 2
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥ पितु आयसु पालिहिं दुहु भाईं। लोक बेद भल भूप भलाईं॥2॥
चौपाई · 3
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥ अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई॥3॥
चौपाई · 4
देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी॥4॥
दोहा · 315
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥315॥
चौपाई · 1
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥1॥
चौपाई · 2
भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥2॥
चौपाई · 3
चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥ संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥3॥
चौपाई · 4
कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥4॥
दोहा · 316
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥316॥
चौपाई · 1
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥ नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥1॥
चौपाई · 2
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥ भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु न कहि न परत सो॥2॥
चौपाई · 3
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥ बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥3॥
चौपाई · 4
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥ जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥4॥
दोहा · 317
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥317॥
चौपाई · 1
जहाँ जनक गुरु गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥1॥
चौपाई · 2
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥2॥
चौपाई · 3
सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥ सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥3॥
चौपाई · 4
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥4॥
दोहा · 318
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥318॥
चौपाई · 1
सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥1॥
चौपाई · 2
पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥2॥
चौपाई · 3
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥ कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥3॥
चौपाई · 4
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥ नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥4॥
दोहा · 319
भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि। बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि॥319॥
चौपाई · 1
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥ करि प्रनामु भेंटीं सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू॥1॥
चौपाई · 2
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥ रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोध सब मातु चढ़ाईं॥2॥
चौपाई · 3
बार बार हिलि मिलि दुहु भाईं। सम सनेहँ जननीं पहुँचाईं॥ साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥3॥
चौपाई · 4
हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता॥ बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें॥4॥
दोहा · 320
गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥320॥
चौपाई · 1
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥1॥
चौपाई · 2
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥ भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥2॥
चौपाई · 3
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥3॥
चौपाई · 4
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।