बालकाण्ड · 03

खल वंदना

बालकाण्ड का प्रकरण 3: खल वंदना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 2

सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥2॥

चौपाई · 1

मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥ सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥1॥

चौपाई · 2

बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥ जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥2॥

चौपाई · 3

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥3॥

चौपाई · 4

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥4॥

चौपाई · 5

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥5॥

चौपाई · 6

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥ सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥6॥

दोहा

बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥3 (क)॥

दोहा

संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु। बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥ 3 (ख)

चौपाई · 1

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥1॥

चौपाई · 2

हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥2॥

चौपाई · 3

तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥ उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥3॥

चौपाई · 4

पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥ बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥

चौपाई · 5

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥5॥

चौपाई · 6

बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥6॥

दोहा · 4

उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति। जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।