बालकाण्ड · 04

संत-असंत वंदना

बालकाण्ड का प्रकरण 4: संत-असंत वंदना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥ बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥1॥

चौपाई · 2

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥2॥

चौपाई · 3

उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥3॥

चौपाई · 4

भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥

चौपाई · 5

गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥

दोहा · 5

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥5॥

चौपाई · 1

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥ तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥1॥

चौपाई · 2

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥ कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥2॥

चौपाई · 3

दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥ दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥3॥

चौपाई · 4

माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥4॥

चौपाई · 5

सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥5॥

दोहा · 6

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥

चौपाई · 1

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥ काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥1॥

चौपाई · 2

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥2॥

चौपाई · 3

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥3॥

चौपाई · 4

किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।