बालकाण्ड · 19
रामजी का शिवजी को विवाह हेतु अनुरोध और सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की परीक्षा
बालकाण्ड का प्रकरण 19: रामजी का शिवजी को विवाह हेतु अनुरोध और सप्तर्षियों द्वारा पार्वतीजी की परीक्षा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥ सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥1॥
चौपाई · 2
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥ तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥ कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥3॥
चौपाई · 4
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥ तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥4॥
दोहा · 77
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु। गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥77॥
चौपाई · 1
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥ बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥1॥
चौपाई · 2
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥ कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥2॥
चौपाई · 3
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥ नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥3॥
चौपाई · 4
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥4॥
दोहा · 78
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह। नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥78॥
चौपाई · 1
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥ चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥1॥
चौपाई · 2
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥ मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥2॥
चौपाई · 3
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥ निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥3॥
चौपाई · 4
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥ पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥4॥
दोहा · 79
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥79॥
चौपाई · 1
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥ अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥1॥
चौपाई · 2
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥ अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥2॥
चौपाई · 3
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥ कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥3॥
चौपाई · 4
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरउँ॥ गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥4॥
दोहा · 80
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥80॥
चौपाई · 1
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥ अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥1॥
चौपाई · 2
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥ तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥2॥
चौपाई · 3
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
चौपाई · 4
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥ देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥4॥
दोहा · 81
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥81॥
चौपाई · 1
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥ बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥1॥
चौपाई · 2
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥ मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥2॥
चौपाई · 3
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥ तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥3॥
चौपाई · 4
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥ तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥4॥
दोहा · 82
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥82॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।