बालकाण्ड · 20

कामदेव का देवकार्य के लिए जाना और भस्म होना

बालकाण्ड का प्रकरण 20: कामदेव का देवकार्य के लिए जाना और भस्म होना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥ सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥1॥

चौपाई · 2

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥ जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥2॥

चौपाई · 3

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥ तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥3॥

चौपाई · 4

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥ अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥4॥

दोहा · 83

सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥83॥

चौपाई · 1

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥ पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥1॥

चौपाई · 2

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥ चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुब मरनु हमारा॥2॥

चौपाई · 3

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥ कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥3॥

चौपाई · 4

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना॥ सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सबु भागा॥4॥

छन्द

भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे। सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे॥ होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा। दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा॥

दोहा · 84

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम। ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम॥84॥

चौपाई · 1

सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥ नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं॥1॥

चौपाई · 2

जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए काम बस समय बिसारी॥2॥

चौपाई · 3

मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥ देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥3॥

चौपाई · 4

इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥ सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी॥4॥

छन्द

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥ अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं। दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥

सोरठा · 85

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥85॥

चौपाई · 1

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥ सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू॥1॥

चौपाई · 2

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे॥ रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥2॥

चौपाई · 3

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥3॥

चौपाई · 4

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा॥4॥

छन्द

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा

दोहा · 86

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥86॥

चौपाई · 1

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा॥ सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने॥1॥

चौपाई · 2

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे॥ भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी॥2॥

चौपाई · 3

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका॥ तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवन कामु भयउ जरि छारा॥3॥

चौपाई · 4

हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी॥ समुझि कामसुख सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी॥4॥

छन्द

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥

दोहा · 87

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु॥87॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।