बालकाण्ड · 49
बारात का जनकपुर में आना और स्वागतादि
बालकाण्ड का प्रकरण 49: बारात का जनकपुर में आना और स्वागतादि। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥ भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥1॥
चौपाई · 2
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥ भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥2॥
चौपाई · 3
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥ दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥3॥
चौपाई · 4
अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥ देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥4॥
दोहा · 305
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥305॥
चौपाई · 1
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥ बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥1॥
चौपाई · 2
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥ करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥2॥
चौपाई · 3
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥ अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥3॥
चौपाई · 4
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥ हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥4॥
दोहा · 306
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास। लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥306॥
चौपाई · 1
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥ बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥1॥
चौपाई · 2
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥ पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥2॥
चौपाई · 3
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥ बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥3॥
चौपाई · 4
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥ चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥4॥
दोहा · 307
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत। उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥307॥
चौपाई · 1
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥ कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥1॥
चौपाई · 2
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥ सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥2॥
चौपाई · 3
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥ बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥3॥
चौपाई · 4
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥ हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥4॥
दोहा · 308
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत। मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥308॥
दोहा · 1
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥ नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥1॥
चौपाई · 2
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥ सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥2॥
चौपाई · 3
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥ सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥3॥
चौपाई · 4
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥ ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥4॥
चौपाई · 309
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज। जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥309॥
चौपाई · 1
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥ इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥1॥
चौपाई · 2
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥ हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥2॥
चौपाई · 3
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥ पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥3॥
चौपाई · 4
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥ बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥4॥
दोहा · 310
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥310॥
चौपाई · 1
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥ तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥1॥
चौपाई · 2
सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग हुइ ढोटा॥ स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥2॥
चौपाई · 3
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥ भरतु राम ही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥3॥
चौपाई · 4
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥ मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥4॥
छन्द
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥ पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं॥ ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
सोरठा · 311
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥311॥
चौपाई · 1
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥ जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥1॥
चौपाई · 2
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥ गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥2॥
चौपाई · 3
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥3॥
चौपाई · 4
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥ सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥4॥
दोहा · 312
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥312॥
चौपाई · 1
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥ सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥1॥
चौपाई · 2
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥ सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥2॥
चौपाई · 3
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥ कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥3॥
चौपाई · 4
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ ॥ गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥4॥
दोहा · 313
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥313॥
चौपाई · 1
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥ सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरुथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥1॥
चौपाई · 2
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥ देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥2॥
चौपाई · 3
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना। नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥3॥
चौपाई · 4
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥ बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥4॥
दोहा · 314
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु। हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥314॥
चौपाई · 1
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥ करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥1॥
चौपाई · 2
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥ देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥2॥
चौपाई · 3
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥ सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥3॥
चौपाई · 4
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥ पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥4॥
दोहा · 315
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥315॥
चौपाई · 1
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥1॥
चौपाई · 2
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥ सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाई मनहीं मन भाई॥2॥
चौपाई · 3
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा। राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥3॥
चौपाई · 4
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥ कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥4॥
छन्द
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥ जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥
दोहा · 316
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव। भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥316॥
चौपाई · 1
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥ संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥1॥
चौपाई · 2
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥ निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥2॥
चौपाई · 3
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥ रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥3॥
चौपाई · 4
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥ मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥4॥
छन्द
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥ एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥
दोहा · 317
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥317॥
चौपाई · 1
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥ पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥1॥
चौपाई · 2
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥ कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥2॥
चौपाई · 3
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥ सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सजह सयानी॥3॥
चौपाई · 4
कपट नारि बर बेष बनाई। मिली सकल रनिवासहिं जाई॥ करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानीं॥4॥
छन्द
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकलहियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
दोहा · 318
जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥318॥
चौपाई · 1
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥ बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥1॥
चौपाई · 2
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥ करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥2॥
चौपाई · 3
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥ समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥3॥
चौपाई · 4
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥ एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥4॥
छन्द
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥ ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥
दोहा · 319
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ। मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥319॥
चौपाई · 1
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥ मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥1॥
चौपाई · 2
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥ सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥2॥
चौपाई · 3
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥ सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥3॥
चौपाई · 4
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥ देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥4॥
छन्द
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥ कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजन परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
दोहा · 320
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस॥ दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥320॥
चौपाई · 1
बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥ कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥1॥
चौपाई · 2
पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती॥ आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥2॥
चौपाई · 3
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥ बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥3॥
चौपाई · 4
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥ पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।