बालकाण्ड · 50
श्री सीता-राम विवाह, विदाई
बालकाण्ड का प्रकरण 50: श्री सीता-राम विवाह, विदाई। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
छन्द
पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥ सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥
दोहा · 321
रामचन्द्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥321॥
चौपाई · 1
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥ बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥1॥
चौपाई · 2
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥ बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं॥2॥
चौपाई · 3
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥ तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारी। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥3॥
चौपाई · 4
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥ सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥4॥
छन्द
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
दोहा · 322
सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥322॥
चौपाई · 1
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥ आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥1॥
चौपाई · 2
सबहिं मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥ हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥2॥
चौपाई · 3
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥ गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥3॥
चौपाई · 4
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥ तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारु। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारु॥4॥
छन्द · 1
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥ मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहें। भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥1॥
छन्द · 2
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥ सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहुँ न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥2॥
दोहा · 323
होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं। बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥323॥
चौपाई · 1
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥॥ सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥1॥
चौपाई · 2
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥ जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥2॥
चौपाई · 3
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥ निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥3॥
चौपाई · 4
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥ बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥4॥
छन्द · 1
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥ जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जे सुकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥1॥
छन्द · 2
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥ करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥2॥
छन्द · 3
बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥ सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥3॥
छन्द · 4
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥ क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥4॥
दोहा · 324
जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान। सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥324॥
चौपाई · 1
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥ जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥1॥
चौपाई · 2
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥2॥
चौपाई · 3
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥ भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥3॥
चौपाई · 4
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं। नेगसहित सब रीति निवेरीं॥ राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥4॥
चौपाई · 5
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥ बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥5॥
छन्द · 1
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु पल नए॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥1॥
छन्द · 2
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥2॥
छन्द · 3
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥ जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥3॥
छन्द · 4
अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥4॥
दोहा · 325
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥325॥
चौपाई · 1
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥ कहि न जा कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥1॥
चौपाई · 2
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥ गज रथ तुरगदास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥2॥
चौपाई · 3
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥ लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥3॥
चौपाई · 4
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥ तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥4॥
छन्द · 1
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥ सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥1॥
छन्द · 2
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥ संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥2॥
छन्द · 3
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥ पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥3॥
छन्द · 4
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥ तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥4॥
दोहा · 326
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥326॥
चौपाई · 1
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥ जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥1॥
चौपाई · 2
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥ कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥2॥
चौपाई · 3
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥ सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे॥3॥
चौपाई · 4
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥ नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निदाना॥4॥
चौपाई · 5
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥ सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥5॥
छन्द · 2
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥ लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥2॥
छन्द · 3
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥ कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥3॥
छन्द · 4
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्यो मुदित मन सबहीं कहा॥ जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥4॥
दोहा · 327
सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥327॥
चौपाई · 1
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥ परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥1॥
चौपाई · 2
सादर सब के पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥ धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥2॥
चौपाई · 3
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥ तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥3॥
चौपाई · 4
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥ सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥4॥
दोहा · 328
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥328॥
चौपाई · 1
पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥1॥
चौपाई · 2
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥ चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई॥2॥
चौपाई · 3
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥ जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥3॥
चौपाई · 4
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा॥ एहि बिधि सबहीं भोजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा॥4॥
दोहा · 329
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥329॥
चौपाई · 1
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥ बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे॥1॥
चौपाई · 2
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥ प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं॥2॥
चौपाई · 3
करि प्रनामु पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥ तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरन काजा॥3॥
चौपाई · 4
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाईं॥ सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनिबृंद बोलाई॥4॥
दोहा · 330
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥330॥
चौपाई · 1
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥ चारि लच्छ बर धेनु मगाईं। काम सुरभि सम सील सुहाईं॥1॥
चौपाई · 2
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं॥ करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू॥2॥
चौपाई · 3
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥ कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥3॥
चौपाई · 4
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा॥ एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू॥4॥
दोहा · 331
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥331॥
चौपाई · 1
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥ दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥1॥
चौपाई · 2
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥ नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥2॥
चौपाई · 3
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥ कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥3॥
चौपाई · 4
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥ भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥4॥
दोहा · 332
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥332॥
चौपाई · 1
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥ सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥1॥
चौपाई · 2
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥ बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥2॥
चौपाई · 3
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठईं जनक अनेक सुसारा॥ तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥3॥
दोहा · 4
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥ कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥4॥
दोहा · 333
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥333॥
चौपाई · 1
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥ चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥1॥
चौपाई · 2
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देह असीस सिखावनु देहीं॥ होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥2॥
चौपाई · 3
सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥ अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥3॥
चौपाई · 4
सादर सकल कुअँरि समुझाईं। रानिन्ह बार बार उर लाईं॥ बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥4॥
दोहा · 334
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥334॥
चौपाई · 1
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥ कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥1॥
चौपाई · 2
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥ को जानै केहिं सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥2॥
चौपाई · 3
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥ पाव नार की हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें॥3॥
चौपाई · 4
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥ एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥4॥
दोहा · 335
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु॥335॥
चौपाई · 1
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥ रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥1॥
चौपाई · 2
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥ बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥2॥
चौपाई · 3
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥ मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥3॥
चौपाई · 4
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥ हृदयँ लगाई कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥4॥
छन्द
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥ परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥
सोरठा · 336
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥336॥
चौपाई · 1
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥ सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥1॥
चौपाई · 2
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥ पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥2॥
चौपाई · 3
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भईं सनेह सिथिल सब रानी॥ पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारीं। बार बार भेटहि महतारीं॥3॥
चौपाई · 4
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥ पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥4॥
दोहा · 337
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु॥337॥
चौपाई · 1
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥1॥
चौपाई · 2
भए बिकल खग मृग एहि भाँती। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥ बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥2॥
चौपाई · 3
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥ लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥3॥
चौपाई · 4
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥ बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुंदर पालकीं मगाईं॥4॥
दोहा · 338
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥338॥
चौपाई · 1
बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥ दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥1॥
चौपाई · 2
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥ भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥2॥
चौपाई · 3
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥ दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥3॥
चौपाई · 4
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥ सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगल मूल सगुन भए नाना॥4॥
दोहा · 339
सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥339॥
चौपाई · 1
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥ भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥1॥
चौपाई · 2
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥ बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं॥2॥
चौपाई · 3
पुनि कह भूपत बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥ राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥3॥
चौपाई · 4
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥ करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥4॥
दोहा · 340
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥340॥
चौपाई · 1
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥ सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥1॥
चौपाई · 2
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥ राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥2॥
चौपाई · 3
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥ ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥3॥
चौपाई · 4
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥ महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥4॥
दोहा · 341
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥341॥
चौपाई · 1
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥ होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥1॥
चौपाई · 2
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥ मैं कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥2॥
चौपाई · 3
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥ सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥3॥
चौपाई · 4
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥ बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही॥4॥
दोहा · 342
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस। भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस॥342॥
चौपाई · 1
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई॥ जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई॥1॥
चौपाई · 2
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥ जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥2॥
चौपाई · 3
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥ कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥3॥
चौपाई · 4
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥ रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।