किष्किन्धाकाण्ड · 07

वर्षा ऋतु वर्णन

किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 7: वर्षा ऋतु वर्णन। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥ कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥1॥

चौपाई · 2

देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥ मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥2॥

चौपाई · 3

मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते॥ फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥3॥

चौपाई · 4

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरत नृपनीति बिबेका॥ बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥4॥

दोहा · 13

लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि। गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥13॥

चौपाई · 1

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥ दामिनि दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ। बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥2॥

चौपाई · 3

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥3॥

चौपाई · 4

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥ सरिता जल जलनिधि महुँ जोई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥4॥

दोहा · 14

हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥14॥

चौपाई · 1

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥1॥

चौपाई · 2

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥2॥

चौपाई · 3

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥ निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥3॥

चौपाई · 4

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥4॥

चौपाई · 5

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥ ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥5॥

चौपाई · 6

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥6॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।