किष्किन्धाकाण्ड · 08

शरद ऋतु का आगमन और श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी- Arrival of Autumn season. Lord Ram’s displeasure towards Sugriv

किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 8: शरद ऋतु का आगमन और श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी- Arrival of Autumn season. Lord Ram’s displeasure towards Sugriv। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥15 क॥

दोहा

कबहु दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥15ख॥

चौपाई · 1

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥1॥

चौपाई · 2

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥2॥

चौपाई · 3

रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥3॥

चौपाई · 4

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥ जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥4॥

चौपाई · 5

बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक भाव भगति जिमि मोरी॥5॥

दोहा · 16

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥16॥

चौपाई · 1

सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा॥ फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥1॥

चौपाई · 2

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥2॥

चौपाई · 3

चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकर द्रोही॥ सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥3॥

चौपाई · 4

देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥4॥

दोहा · 17

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥17॥

चौपाई · 1

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालुह जीति निमिष महुँ आनौं॥1॥

चौपाई · 2

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनउँ सोई॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥2॥

चौपाई · 3

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥ जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥3॥

चौपाई · 4

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥ लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाई गहे कर बाना॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।