किष्किन्धाकाण्ड · 09
लक्ष्मणजी का कोप और सुग्रीव-राम संवाद
किष्किन्धाकाण्ड का प्रकरण 9: लक्ष्मणजी का कोप और सुग्रीव-राम संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 18
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव। भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥18॥
चौपाई · 1
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥ निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥1॥
चौपाई · 2
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥ अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥2॥
चौपाई · 3
कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥ तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता॥3॥
चौपाई · 4
भय अरु प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥ एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥4॥
दोहा · 19
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार। ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥19॥
चौपाई · 1
चर नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥ क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना॥1॥
चौपाई · 2
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥ तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥2॥
चौपाई · 3
करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए॥ तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा॥3॥
चौपाई · 4
नाथ विषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं। सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥4॥
चौपाई · 5
पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई॥5॥
दोहा · 20
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ। रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ॥20॥
चौपाई · 1
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी॥ नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥ अतिसय प्रबल देव तव माया॥ छूटइ राम करहु जौं दाया॥1॥
चौपाई · 2
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी॥ मैं पावँर पसु कपि अति कामी॥ नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥2॥
चौपाई · 3
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया॥ यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई॥3॥
चौपाई · 4
तब रघुपति बोले मुसुकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई॥ अब सोइ जतनु करह मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।