लंकाकाण्ड · 04
रावण-प्रहस्त संवाद, भगवान राम का सुबेल पर्वत पर विश्राम करना तथा चंद्रमा के उदय होने का वर्णन
लंकाकाण्ड का प्रकरण 4: रावण-प्रहस्त संवाद, भगवान राम का सुबेल पर्वत पर विश्राम करना तथा चंद्रमा के उदय होने का वर्णन। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 7
अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥7॥
चौपाई · 1
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥ सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥1॥
चौपाई · 2
बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला॥ देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें॥2॥
चौपाई · 3
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥3॥
चौपाई · 4
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेहिं बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा॥ कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा॥4॥
चौपाई · 5
कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा॥5॥
दोहा · 8
सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि। नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि॥8॥
दोहा · 1
कहहिं सचिव सठ ठकुर सोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥ बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥॥1॥
दोहा · 2
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू॥ सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा॥॥2॥
दोहा · 3
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला॥ सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई॥3॥
दोहा · 4
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर। प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं॥4॥
दोहा · 5
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥ प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥5॥
दोहा · 9
नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि। नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥9॥
दोहा · 1
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा॥ सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई॥1॥
दोहा · 2
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई॥ सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा॥2॥
दोहा · 3
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥ संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा॥3॥
दोहा · 4
लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा॥ बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन॥4॥
दोहा · 5
बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना॥5॥
दोहा · 10
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास॥10॥
चौपाई · 1
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥1॥
चौपाई · 2
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥ ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहिं आसन आसीन कृपाला॥2॥
चौपाई · 3
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥3॥
चौपाई · 4
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥ प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥4॥
दोहा
ऐहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन॥11 क॥
दोहा
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक॥11 ख॥
चौपाई · 1
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥ मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥1॥
चौपाई · 2
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥2॥
चौपाई · 3
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई॥3॥
चौपाई · 4
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं॥4॥
चौपाई · 5
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा॥ बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी॥5॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।