लंकाकाण्ड · 05
श्री रामजी के बाण से रावण के मुकुट-छत्रादि का गिरना, मन्दोदरी का फिर रावण को समझाना और श्री राम की महिमा कहना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 5: श्री रामजी के बाण से रावण के मुकुट-छत्रादि का गिरना, मन्दोदरी का फिर रावण को समझाना और श्री राम की महिमा कहना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास॥12 क॥
दोहा
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान॥12 ख॥
चौपाई · 1
देखु विभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥1॥
चौपाई · 2
कहत विभीषन सुनहू कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥2॥
चौपाई · 3
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥3॥
चौपाई · 4
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहू सुरभूपा। प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाव बान संधाना॥4॥
दोहा
छत्र मुकुट तांटक तब हते एकहीं बान। सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥13 क॥
दोहा
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आई निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥13 ख॥
चौपाई · 1
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा। सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी॥1॥
चौपाई · 2
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई। सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही॥2॥
चौपाई · 3
सयन करहु निज निज गृह जाईं। गवने भवन सकल सिर नाई॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥3॥
चौपाई · 4
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥ कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ लग धरहू॥4॥
दोहा · 14
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥14॥
चौपाई · 1
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥ भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥1॥
चौपाई · 2
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा॥ श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी॥2॥
चौपाई · 3
अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥ आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥3॥
चौपाई · 4
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥ उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥4॥
दोहा
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥15 क॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।