लंकाकाण्ड · 10
माल्यवान का रावण को समझाना, मेघनाद का प्रचंड क्रोध सहित रण में आगमन
लंकाकाण्ड का प्रकरण 10: माल्यवान का रावण को समझाना, मेघनाद का प्रचंड क्रोध सहित रण में आगमन। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 47
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥47॥
चौपाई · 1
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥ राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥1॥
चौपाई · 2
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥ आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥2॥
चौपाई · 3
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥ बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥3॥
चौपाई · 4
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥ बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥4॥
दोहा
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥48 क॥
दोहा
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥48 ख॥
चौपाई · 1
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥ ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुँह करि जाहि अभागे॥1॥
चौपाई · 2
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥ तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥2॥
चौपाई · 3
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥ कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥3॥
चौपाई · 4
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥4॥
चौपाई · 5
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥5॥
छन्द
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए। गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहि जहँ सो तहँ निसिचर हए॥
दोहा · 49
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ। उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥49॥
चौपाई · 1
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥ कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥1॥
चौपाई · 2
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥2॥
चौपाई · 3
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥ जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥3॥
चौपाई · 4
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥4॥
दोहा · 50
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥50॥
चौपाई · 1
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥1॥
चौपाई · 2
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥ बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥2॥
चौपाई · 3
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥3॥
चौपाई · 4
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥4॥
दोहा · 51
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥51॥
चौपाई · 1
: नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥1॥
चौपाई · 2
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥ बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥2॥
चौपाई · 3
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना ऐहि लेखें॥ कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥3॥
चौपाई · 4
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।