लंकाकाण्ड · 11

लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना, हनुमानजी का संजीवनी के लिए जाना, कालनेमि-रावण संवाद, मकरी एवं कालनेमि उद्धार

लंकाकाण्ड का प्रकरण 11: लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना, हनुमानजी का संजीवनी के लिए जाना, कालनेमि-रावण संवाद, मकरी एवं कालनेमि उद्धार। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 52

आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥52॥

चौपाई · 1

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥1॥

चौपाई · 2

भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥2॥

चौपाई · 3

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥3॥

चौपाई · 4

असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥4॥

दोहा · 53

रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥53॥

चौपाई · 1

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमति किंसुक के तरु जैसे॥ लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥1॥

चौपाई · 2

एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥ क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥2॥

चौपाई · 3

नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥ रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥3॥

चौपाई · 4

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥ मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥

दोहा · 54

मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ। जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥54॥

चौपाई · 1

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥1॥

चौपाई · 2

यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥ संध्या भय फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥2॥

चौपाई · 3

व्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥ तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥3॥

चौपाई · 4

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥4॥

दोहा · 55

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन। कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥55॥

चौपाई · 1

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥1॥

चौपाई · 2

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥2॥

चौपाई · 3

भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥3॥

चौपाई · 4

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥4॥

दोहा · 56

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार। राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥56॥

चौपाई · 1

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥1॥

चौपाई · 2

राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥2॥

चौपाई · 3

होत महा रन रावन रामहिं। जितिहहिं राम न संसय या महिं॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥3॥

चौपाई · 4

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥4॥

दोहा · 57

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान। मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥57॥

चौपाई · 1

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥1॥

चौपाई · 2

अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू॥2॥

चौपाई · 3

सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥3॥

चौपाई · 4

देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥ गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।