लंकाकाण्ड · 12
भरतजी के बाण से हनुमान् का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान् संवाद, श्री रामजी की प्रलापलीला
लंकाकाण्ड का प्रकरण 12: भरतजी के बाण से हनुमान् का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान् संवाद, श्री रामजी की प्रलापलीला। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 58
देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥58॥
चौपाई · 1
परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥ सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥1॥
चौपाई · 2
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥2॥
चौपाई · 3
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥ जौं मोरें मन बच अरु काया॥ प्रीति राम पद कमल अमाया॥3॥
चौपाई · 4
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥4॥
सोरठा · 59
लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल। प्रीति न हृदय समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥59॥
चौपाई · 1
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥ कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥1॥
चौपाई · 2
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥2॥
चौपाई · 3
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥ चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥3॥
चौपाई · 4
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥4॥
दोहा
तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत। अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥60 क॥
दोहा
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार। मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥60 ख॥
चौपाई · 1
उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥ अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥1॥
चौपाई · 2
सकहु न दुखित देखि मोहि काउ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥2॥
चौपाई · 3
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥3॥
चौपाई · 4
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।