लंकाकाण्ड · 16
मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना
लंकाकाण्ड का प्रकरण 16: मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥ डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना॥1॥
चौपाई · 2
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥2॥
चौपाई · 3
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥3॥
चौपाई · 4
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥ मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥4॥
चौपाई · 5
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥ पुनि रघुपति सैं जूझै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥5॥
चौपाई · 6
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥ नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥6॥
चौपाई · 7
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥7॥
दोहा · 73
गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास। सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥73॥
चौपाई · 1
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥1॥
चौपाई · 2
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥ जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥2॥
चौपाई · 3
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥ अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥3॥
चौपाई · 4
मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो। महि पछारि निज बल देखरायो॥4॥
चौपाई · 5
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥ इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥5॥
दोहा
खगपति सब धरि खाए माया नाग बरुथ। माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ॥74 क॥
दोहा
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ। चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥74 ख॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।