लंकाकाण्ड · 17

मेघनाद यज्ञ विध्वंस, युद्ध और मेघनाद उद्धार

लंकाकाण्ड का प्रकरण 17: मेघनाद यज्ञ विध्वंस, युद्ध और मेघनाद उद्धार। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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चौपाई · 1

मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥ तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥1॥

चौपाई · 2

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा॥ मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥2॥

चौपाई · 3

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥3॥

चौपाई · 4

लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई॥ तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥4॥

चौपाई · 5

मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥ जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन॥5॥

चौपाई · 6

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥ प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥6॥

चौपाई · 7

जौं तेहि आजु बंधे बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं॥ जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई॥7॥

दोहा · 75

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत। अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥75॥

चौपाई · 1

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥1॥

चौपाई · 2

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥ लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे॥2॥

चौपाई · 3

आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥3॥

चौपाई · 4

प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥4॥

चौपाई · 5

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥ आवत देखि कुरद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला॥5॥

चौपाई · 6

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥ बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई॥6॥

चौपाई · 7

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥ लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। ऐहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥7॥

चौपाई · 8

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥ छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥8॥

दोहा · 76

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान। धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥76॥

चौपाई · 1

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥ तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥1॥

चौपाई · 2

बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं॥ जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा॥2॥

चौपाई · 3

अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिंधु पहिं आए॥ सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं॥3॥

चौपाई · 4

मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥ नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा॥4॥

दोहा · 77

तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाईं सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि॥77॥

चौपाई · 1

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥1॥

चौपाई · 2

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जाकर मन डोला॥2॥

चौपाई · 3

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥3॥

चौपाई · 4

अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥4॥

दोहा · 5

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला॥5॥

छन्द

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

दोहा · 78

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥78॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।