लंकाकाण्ड · 20
इंद्र का श्री रामजी के लिए रथ भेजना, राम-रावण युद्ध
लंकाकाण्ड का प्रकरण 20: इंद्र का श्री रामजी के लिए रथ भेजना, राम-रावण युद्ध। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
मज्जहिं भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला॥ काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं॥1॥
चौपाई · 2
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥ कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥2॥
चौपाई · 3
खैचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥3॥
चौपाई · 4
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूति पिसाच बधू नभ नंचहिं॥ भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं॥4॥
चौपाई · 5
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥5॥
छन्द
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥ बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए। संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥
दोहा · 88
रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥88॥
चौपाई · 1
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा॥ सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा॥1॥
चौपाई · 2
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा॥ चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी॥2॥
चौपाई · 3
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी॥ सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी॥3॥
चौपाई · 4
सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची॥ देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी॥4॥
छन्द
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे। जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे॥ निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी। माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी॥
दोहा · 89
बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर। द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर॥89॥
चौपाई · 1
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सम्मुख धावा॥1॥
चौपाई · 2
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥2॥
चौपाई · 3
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥3॥
चौपाई · 4
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाही॥ आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥4॥
चौपाई · 5
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥5॥
छन्द
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
दोहा · 90
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥90॥
चौपाई · 1
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर॥॥ नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए॥1॥
चौपाई · 2
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा॥ छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई॥2॥
चौपाई · 3
कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै॥ निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें॥3॥
चौपाई · 4
तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि॥ राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा॥4॥
छन्द
भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे। कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥ मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे। चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥
दोहा · 91
तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल। राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥91॥
चौपाई · 1
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा॥ रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका॥1॥
चौपाई · 2
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना॥ बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के॥2॥
चौपाई · 3
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा॥ तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैंचि सरासन छाँड़े सायक॥3॥
चौपाई · 4
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥ दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥4॥
चौपाई · 5
स्रवत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना॥ तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे॥5॥
चौपाई · 6
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने॥ प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए॥6॥
चौपाई · 7
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥ रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥7॥
छन्द
जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्रवत सोनित धावहीं। रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरत न पावहीं॥ एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं। जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं॥
दोहा · 92
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि होहिं अपार। सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥92॥
चौपाई · 1
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥ गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥1॥
चौपाई · 2
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥ दंड एक रथ देखि न परेउ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥2॥
चौपाई · 3
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥ सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे॥3॥
चौपाई · 4
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥ कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥4॥
छन्द
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले। संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं। करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥
दोहा · 93
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड। चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥93॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।