लंकाकाण्ड · 21
रावण का विभीषण पर शक्ति छोड़ना, रावण-हनुमान् युद्ध, रावण का माया रचना, रामजी द्वारा माया नाश, भयंकर युद्ध और रावण की मूर्छा
लंकाकाण्ड का प्रकरण 21: रावण का विभीषण पर शक्ति छोड़ना, रावण-हनुमान् युद्ध, रावण का माया रचना, रामजी द्वारा माया नाश, भयंकर युद्ध और रावण की मूर्छा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥ तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥1॥
चौपाई · 2
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥ देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥2॥
चौपाई · 3
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥ सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥3॥
चौपाई · 4
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥ राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥4॥
छन्द
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो। दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्यो॥ द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै। रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥
दोहा · 94
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ। सो अब भिरत काल ज्यों श्री रघुबीर प्रभाउ॥94॥
चौपाई · 1
देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥ रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥1॥
चौपाई · 2
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥ पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥2॥
चौपाई · 3
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना॥ लरत अकास जुगल सम जोधा। एकहि एकु हनत करि क्रोधा॥3॥
चौपाई · 4
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं॥ बुधि बल निसिचर परइ न पारयो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो॥4॥
छन्द
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले। रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचण्ड भुज बल दलमले॥
दोहा · 95
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड। कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड॥95॥
चौपाई · 1
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका॥ रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते॥1॥
चौपाई · 2
देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा॥ भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा॥2॥
चौपाई · 3
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥ डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई॥3॥
चौपाई · 4
सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥ रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥4॥
छन्द
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे। चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे। मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥
दोहा · 96
सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस। सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस॥96॥
चौपाई · 1
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी॥ रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे॥1॥
चौपाई · 2
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥ प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥2॥
चौपाई · 3
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥ सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥3॥
चौपाई · 4
हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥ देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥4॥
छन्द
गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो। संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो॥ करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई। किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई॥
दोहा · 97
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप। काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप॥97॥
चौपाई · 1
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥ मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥1॥
चौपाई · 2
बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला॥ बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा॥2॥
चौपाई · 3
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भागि चलहिं एक लातन्ह मारी। तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ॥3॥
चौपाई · 4
रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥ गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥4॥
चौपाई · 5
कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी॥ पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे॥5॥
चौपाई · 6
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर॥ मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा॥6॥
चौपाई · 7
संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी॥ भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना॥7॥
चौपाई · 8
देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता॥8॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।