लंकाकाण्ड · 22
त्रिजटा-सीता संवाद
लंकाकाण्ड का प्रकरण 22: त्रिजटा-सीता संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
छन्द
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा। गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥ मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो॥ निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करय भयो॥
दोहा · 98
मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास। निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास॥98॥
चौपाई · 1
तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥ सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी॥1॥
चौपाई · 2
मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता॥ होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता॥2॥
चौपाई · 3
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही॥3॥
चौपाई · 4
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा॥ जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए॥4॥
चौपाई · 5
रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना॥5॥
चौपाई · 6
बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की॥ कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी॥6॥
चौपाई · 7
प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही॥7॥
छन्द
एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है॥ सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा॥
दोहा · 99
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान। तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान॥99॥
चौपाई · 1
अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही॥1॥
चौपाई · 2
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँति। जुग सम भई सिराति न राती॥ करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी॥2॥
चौपाई · 3
जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥ सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा॥3॥
चौपाई · 4
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा। सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥4॥
चौपाई · 5
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥ सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥5॥
चौपाई · 6
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी॥6॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।